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सुप्रीम कोर्ट का NEET स्टूडेंट को अबॉर्शन से इनकार:बेंच बोली- भ्रूण को जीने का मौलिक अधिकार; 20 साल की युवती 27 महीने की प्रेग्नेंट

1 week ago 15



सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर विचार करने से बुधवार (15) मई इनकार कर दिया, जिसमें 27 महीने की गर्भवती 20 साल की युवती ने अबॉर्शन की इजाजत मांगी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गर्भ में पल रहे भ्रूण को भी जीने का मौलिक अधिकार है। जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस एस वी एन भट्टी और जस्टिस संदीप मेहता में याचिका को खारिज किया है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट युवती को अबॉर्शन के इजाजत देने से इनकार कर दिया था। जस्टिस गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हम कानून के विपरीत कोई आदेश पारित नहीं कर सकते। कोर्ट रूम लाइव... बेंच- गर्भ में पल रहे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार है। आप (याचिकाकर्ता) इस बारे में क्या कहते हैं? वकील- मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून केवल मां के बारे में बात करता है। यह मां के लिए बना है। बेंच- गर्भावस्था की अवधि अब 7 महीने से अधिक हो गयी है। बच्चे के जीवित रहने के अधिकार के बारे में क्या? आप इसे कैसे संबोधित करते हैं? वकील- भ्रूण गर्भ में है और जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता, यह मां का अधिकार है। याचिकाकर्ता इस समय गंभीर दर्दनाक स्थिति में है। वो बाहर भी नहीं आ सकती, NEET परीक्षा के लिए कोचिंग कर रही है। इस स्थिति में समाज का सामना नहीं कर सकती। उसकी मानसिक और शारीरिक हेल्थ पर विचार किया जाना चाहिए। इस पर बेंच ने कहा- माफ करें। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था- अबॉर्शन न तो नैतिकता और न ही कानूनी रूप से स्वीकार्य दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी मामले में 7 मई के आदेश में कहा था कि मेडिकल रिपोर्ट में भ्रूण बिल्कुल स्वस्थ पाया गया है। प्रेग्नेंसी जारी रखने में मां और बच्चे को कोई खतरा नहीं है। ऐसे में अबॉर्शन कराना न तो नैतिकता के आधार पर ठीक होगा और न ही कानूनी रूप से स्वीकार्य होगा। युवती की दलील थी कि वो अभी स्टूडेंट है और NEET एग्जाम की तैयारी कर रही है। उसे 16 अप्रैल को अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में पता चला था। तब 27 हफ्ते बीत चुके थे। उसने ये भी कहा था कि मेरी अभी शादी नहीं हुई है और इनकम का भी कोई सोर्स नहीं है। ऐसे में प्रेग्नेंसी जारी रखने से मेरी बदनामी होगी और करियर पर भी फर्क पड़ेगा। कोर्ट ने इस पर कहा था कि डिलीवरी के लिए आप AIIMS जा सकती हैं। वहां आपको प्रेग्नेंसी जारी रखने को लेकर डॉक्टरों के अहम सुझाव भी मिलेंगे। डिलीवरी के बाद अगर आप बच्चे को एडॉप्शन के लिए देना चाहती हैं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है। एडॉप्शन जल्द से जल्द और बिना किसी दिक्कत के हो, यह केंद्र सरकार सुनिश्चित करेगी। पूरी खबर पढ़ें प्रेग्नेंसी अबॉर्शन का नियम क्या कहता है? मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत, किसी भी शादीशुदा महिला, रेप विक्टिम, दिव्यांग महिला और नाबालिग लड़की को 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी अबॉर्ट करने की इजाजत दी जाती है। 24 हफ्ते से ज्यादा की प्रेग्नेंसी होने पर मेडिकल बोर्ड की सलाह पर कोर्ट से अबॉर्शन की इजाजत लेनी पड़ती है। MTP एक्ट में बदलाव साल 2020 में किया गया था। उससे पहले 1971 में बना कानून लागू होता था। ये खबरें भी पढ़ें... सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन की इजाजत दी सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल की रेप विक्टिम को करीब 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन कराने की इजाजत दी। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के लोकमान्य तिलक अस्पताल को तत्काल अबॉर्शन के लिए इंतजाम करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने आदेश सुनाते हुए कहा- यह असाधारण मामला है। हर घंटा विक्टिम के लिए अहम है। पूरी खबर पढ़ें... दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 हफ्ते की प्रेग्नेंट विधवा को अबॉर्शन की इजाजत दी, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलटा 5 जनवरी 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी से जूझ रही 29 हफ्ते की प्रेग्नेंट विधवा को अबॉर्शन की इजाजत दी थी। कोर्ट ने कहा- प्रेग्नेंसी जारी रखने से महिला की मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है। रिप्रोडक्शन चॉइस राइट में बच्चे को जन्म न देने का अधिकार भी शामिल है। पूरी खबर पढ़ें...
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