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बच्चों के दिमाग पर गलत असर पड़ रहा; जानिए उनको मैनेज करने का तरीका

1 month ago 12

​​​​एश्ले अब्राम्सन. कोरोनावायरस महामारी के दौर में बच्चे घर पर ही रह रहे हैं। बच्चों की जरूरी एक्टिविटीज वायरस के चलते बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं। स्कूल, एक्सरसाइज और गेम्स बच्चों के लिए बहुत जरूरी हैं। इनके ना हो पाने से बच्चों में चिड़चिड़ापन ज्यादा सामने आ रहा है। ऐसे में पैरेंट्स के सामने बड़ी चुनौती है कि वे बच्चों को कैसे संभालें। अमेरिकी नागरिक सिम्पसन कहती हैं कि उन्होंने अपनी बेटी को संभालने के लिए बहुत कुछ ट्राई किया, लेकिन चुपचाप उसके आस-पास बैठे रहने के अलावा कोई और तरीका काम नहीं आया। सिम्पसन ने कहा, “मैं अपनी बेटी से कई बार पूछती हूं कि वो क्यों इरिटेट होती है, तो वह मुझसे कहती है कि उसे भी नहीं पता।”

“मेल्टडाउन” एक दिमागी प्रक्रिया के चलते होता है

छोटे बच्चों में मेल्टडाउन बहुत आम है। यह एक मनोवैज्ञानिक दिमागी प्रक्रिया है। जब बच्चों को किसी चीज से खतरा लगने लगता है या सिक्योरिटी की कमी लगने लगती है तो वे इसी प्रक्रिया के तहत चिड़चिड़ापन जाहिर करते हैं। इस दौरान पैरेंट्स को बच्चों से तब-तक कोई बात नहीं करनी चाहिए, जब-तक वह मिड-फ्रीकआउट स्टेज में न आ जाएं।जब बच्चा जिद या गुस्सा करते हुए अचानक शांत हो जाता है तो उसे मिड-फ्रेकआउट स्टेज कहते हैं। यह लगभग सभी बच्चों में कॉमन है। इस स्टेज में बात करने पर पैरेंट्स यह पता लगा सकते हैं कि बच्चा क्यों जिद कर रहा है।

मेल्टडाउन की साइकोलॉजी

व्हाई वी स्नैप के राइटर और न्यूरो साइंटिस्ट आर. डॉग्लस फील्ड्स के मुताबिक, चिड़चिड़ेपन में दिमाग के दो हिस्से इन्वॉल्व रहते हैं। पहला हिस्सा है अमिग्डाला, जो गुस्से और डर जैसी भावनाओं पर प्राथमिक तौर पर रिएक्ट करता है। दूसरा हिस्सा है हाइपोथैलेमस, जो शरीर के हार्ट रेट और टेम्प्रेचर जैसे फंक्शन को कंट्रोल करता है।आर. डॉग्लस कहते हैं कि जब आपके बच्चे बेड पर अकेले सोने जैसी जिद करें, तो आपको यह समझ लेना चाहिए कि उसके दिमाग के पहले हिस्से ‘अमिग्डाला’ ने कोई थ्रेट या डर डिटेक्ट किया है। इसी वजह से दिमाग के दूसरे हिस्से, 'हाइपोथैलेमस’ उसे सोने की तरफ आकर्षित करना शुरू कर दिया है और वह बेड पर अकेले सोने की जिद करने लगा। ऐसे में आपको अपने बच्चे को वही करने देना चाहिए, जो वह करने की जिद कर रहा है। आप तब-तक उसे न रोकें, जब-तक कि वह किसी खतरे से भरे काम की जिद न कर रहा हो।

सबसे पहले अपने इमोशन को कंट्रोल करें

प्ले थेरेपिस्ट लिसा डिओन के मुताबिक, अगर आपके बच्चे का मूड अपसेट है तो उससे एंगेज करने से पहले आपको अपने इमोशन को कंट्रोल करना चाहिए।आपका बच्चा गुस्सा कर रहा है, लेकिन गुस्से में वह कोई खतरे से भरा काम नहीं कर रहा है तो उसे अकेला छोड़ दें। आप वहां से अलग हो जाएं, कहीं जाकर आप कुछ गहरी सांसें लें या कुछ भी ऐसा करें, जिससे आपका खुद का टेम्पर नॉर्मल रहे। बच्चे से एंगेज करने से पहले खुद के इमोशन को कंट्रोल करना जरूरी है।ड्यूक सेंटर ऑफ चाइल्ड और फैमिली पॉलीसी में साइंटिस्ट कैटी रोसंबाल्म के मुताबिक, आप खुद शांत रहकर ही अपने बच्चे को शांत कर सकते हैं।

अब आप अपने बच्चे के रिएक्शन को मैनेज कर सकते हैं

पहले खुद के इमोशन को मैनेज करने के बाद आप बच्चे के रिएक्शन को मैनेज कर सकते हैं। कैटी रोसंबाल्म के मुताबिक, बच्चों को शांत करने के लिए कामनेस यानी शांति जरूरी है।जब आप अपने बच्चे को शांत कराने के प्रोसेस में होते हैं, तो आपको अपने शब्दों से ज्यादा अपने एक्शन पर फोकस करना चाहिए। आपका बच्चा आपके शब्दों से आप के भाव नहीं समझ सकता लेकिन, आपके एक्शन से वह आपके भाव को तुरंत समझ जाएगा। बच्चे को मैनेज करने में आपके बॉडी का पॉश्चर, बात करने का टोन और आपके चेहरे का एक्सप्रेशन बहुत जरूरी होता है।हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर डॉक्टर चार्ल्स नेल्सन के मुताबिक, बच्चे को मनाने के दौरान सबसे अच्छा जैश्चर होता है कि आप उसके सामने घुटनों के बल बैठ जाएं और उनके दोनों हाथों को पकड़ कर उनकी आंखों में देखकर बात करें। ऐसे में बच्चे के जल्दी नॉर्मल होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं।

अब बच्चे के गुस्से की वजह खोजें

बच्चा जब गुस्से में हो तो उसे यह बताना कि गुस्सा नहीं करना चाहिए, यह गलत तरीका है। यह तरीका बहुत कम काम करता है। सबसे पहले आपको ऊपर दिए गए तरीकों को अपना कर अपने बच्चे को शांत करना चाहिए।अब आप उससे यह पूछ सकते हैं कि उसे हुआ क्या था। आपको इस बात का ध्यान रखना है कि पूछताछ के दौरान बच्चा कहीं यह ना महसूस करे कि वह गलत है। अब इस स्टेज में आप अपने बच्चे को कहीं घूमने ले जा सकते हैं या किसी भी तरह से स्पेशल फील करा के उसे समझा सकते हैं।

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